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कृपालुजी महाराज का रूपध्यान कैसे भगवान प्रेम जागृत करता है?

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मानव जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य है भगवान से प्रेम करना और उनका साक्षात्कार प्राप्त करना। लेकिन यह दिव्य प्रेम तभी जागृत होता है जब हृदय पवित्र और भावनाओं से कोमल बनता है। इसी भावनात्मक पवित्रता को जगाने का सबसे प्रभावी साधन है कृपालुजी महाराज का रूपध्यान, जिसमें साधक अपने प्रिय भगवान के सुंदर स्वरूप का चिंतन करता है। जगद्गुरु कृपालु महाराज ने रूपध्यान को साधना का प्राण बताया है। वे समझाते हैं कि केवल दर्शन या नाम जप काफी नहीं है, जब तक मन भगवान के रूप में रस नहीं लेता। जब साधक ध्यान में भगवान के मुखकमल, उनकी मुस्कान या उनकी आंखों में झलकते करुणा भाव का अनुभव करता है, तब हृदय में सहज ही प्रेम झरने लगता है। यही रूपध्यान की सफलता है जहां साधक और साध्य दोनों एक हो जाते हैं। रूपध्यान का विज्ञान और हृदय परिवर्तन रूपध्यान केवल कल्पना नहीं है, यह हृदय को ईश्वरानुराग से भरने की प्रक्रिया है। कृपालु महाराज के अनुसार, जब हम मन को संसार से हटाकर भगवान के स्वरूप में लगाते हैं, तो मन की दिशा बदल जाती है। लगातार भावपूर्ण ध्यान से संसार की आसक्ति कम होती है और भगवान प्रेम प्रकट होने लगता है। यह प्रेम...

Jagadguru Kripalu Ji Maharaj’s Message of Divine Love in This Sharad Purnima

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Sharad Purnima, the night of divine radiance and spiritual bliss, holds immense significance for devotees across India. It is believed to be the night when the moon shines with its fullest brightness, showering nectar-like light that symbolizes divine love and purity. For followers of Jagadguru Kripalu Ji Maharaj , this night carries even deeper meaning it is celebrated as a tribute to his boundless wisdom, divine compassion, and eternal message of love. The Spiritual Essence of Sharad Purnima Sharad Purnima represents the union of the soul with the Divine the moment when human consciousness rises above worldly illusions and connects with eternal truth. Kripalu Ji Maharaj often explained that the moon of this night reflects the light of divine love that resides within every being. He encouraged devotees to see Sharad Purnima not just as a festival of nature, but as an opportunity for inner awakening. The cool moonlight, he said, symbolizes the soothing grace of God that removes the hea...

पढ़ाई में संतुलन लाने के लिए कर्मयोग को अपनाना कृपालु जी महाराज की शिक्षा के अनुसार

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पढ़ाई का दबाव छात्रों को अक्सर तनावग्रस्त कर देता है, लेकिन जगद्गुरु कृपालु महाराज की कर्मयोग शिक्षा इसे संतुलित बनाने का सरल मार्ग दिखाती है। कर्मयोग का अर्थ है सांसारिक कर्तव्यों का नि:स्वार्थ पालन करते हुए मन को भगवान में लगाना मन यार में, तन कार में। उनका जीवन परिचय बताता है कि वे एक साधारण बालक से भक्ति के महासागर बने, जिन्होंने गीता के सिद्धांतों को सरल बनाया। कृपालु महाराज के प्रवचन कर्मयोग को भक्ति का व्यावहारिक रूप बताते हैं, जहां पढ़ाई को ईश्वर की सेवा मानकर बोझ हल्का होता है। छात्र यदि प्रयासों को राधा कृष्ण को अर्पित करें, तो एकाग्रता बढ़ती है और थकान कम। अनुयायी साझा करते हैं कि यह शिक्षा परीक्षा की चिंता से मुक्ति देती है। कर्मयोग का मूल सिद्धांत जगद्गुरु कृपालु महाराज ने सिखाया कि कर्मयोग में आसक्ति रहित कर्म ही संतुलन लाता है पढ़ाई करते हुए मन भगवान के स्वरूप पर टिका रहे। रूपध्यान मेडिटेशन से शुरू करें: अध्ययन सत्र के बीच भगवान का दिव्य रूप चिंतन करें, जो मन को शांत रखता है। कृपालु महाराज के भजन इस अभ्यास को मधुर बनाते हैं, सुनते ही प्रेरणा जागृत हो जाती है। प्रवचनों ...

कृपालुजी महाराज के अनुसार मानव जीवन का असली लक्ष्य क्या है

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मानव जीवन अनमोल है। यह केवल शारीरिक अस्तित्व या सांसारिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं है। जगद्गुरु कृपालु महाराज ने अपने उपदेशों में बार-बार इस तथ्य पर प्रकाश डाला कि मनुष्य जीवन का उद्देश्य केवल सुख-सुविधाओं का भोग या प्रसिद्धि प्राप्त करना नहीं, बल्कि आत्मा की वास्तविक पहचान करके ईश्वर प्रेम की प्राप्ति करना है। कृपालुजी महाराज के अनुसार, जब तक मनुष्य अपने जीवन की दिशा केवल भौतिक उपलब्धियों की ओर रखता है, तब तक वह अधूरा रहता है। असली सुख और शांति का अनुभव तभी संभव है, जब व्यक्ति अपने भीतर छिपे दिव्य तत्व को पहचान कर उसे ईश्वर के चरणों में समर्पित कर दे। उन्होंने कहा था कि मनुष्य शरीर केवल कर्म करने का साधन है, पर आत्मा का असली लक्ष्य परमात्मा से मिलन है। आत्मा और ईश्वर का संबंध उनकी शिक्षाओं में आत्मा को परमात्मा का अंश बताया गया है। जैसे सागर की एक बूँद सागर से अलग नहीं, वैसे ही आत्मा भी ईश्वर से अलग नहीं है। लेकिन अज्ञानवश हम खुद को शरीर, नाम और पहचान तक सीमित कर लेते हैं। जब मनुष्य इस भ्रम से मुक्त होता है और ईश्वर को अपना मान लेता है, तभी जीवन सफल होता है। कृपालु महाराज के प्रवचन ज...

कृपालुजी महाराज की शिक्षा से पढ़ाई में सफलता के लिए क्या करें

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हर विद्यार्थी के जीवन में सफलता पाने की सबसे बड़ी चाह होती है, लेकिन अधिकतर लोग यह नहीं समझ पाते कि वास्तविक सफलता केवल मेहनत या बुद्धिमत्ता से नहीं, बल्कि सही दृष्टिकोण और मन की एकाग्रता से आती है। जगद्गुरु कृपालु महाराज की शिक्षाएँ विद्यार्थियों के लिए गहरी प्रेरणा प्रदान करती हैं, क्योंकि वे जीवन के हर क्षेत्र में आध्यात्मिकता और कर्म का संतुलन समझाते हैं। मन की स्थिरता और एकाग्रता का अभ्यास कृपालुजी महाराज कहते थे कि जब तक मन स्थिर नहीं होगा, तब तक विद्या का सच्चा लाभ नहीं मिल सकता। विद्यार्थी को सबसे पहले अपने मन को नियंत्रित करने की साधना करनी चाहिए। इसके लिए प्रतिदिन कुछ समय ध्यान, प्रार्थना या ईश्वर-स्मरण में बिताना अत्यंत लाभदायक होता है। इससे एकाग्रता बढ़ती है और पढ़ाई के प्रति लगाव भी स्वाभाविक रूप से बढ़ता है। मेहनत के साथ संयम और श्रद्धा कृपालु महाराज के प्रवचनों में बार-बार यह संदेश मिलता है कि बिना श्रद्धा और संयम के कोई लक्ष्य प्राप्त नहीं हो सकता। जब विद्यार्थी अपने अध्ययन के प्रति श्रद्धा रखता है और अपने मन को अनुशासित रखता है, तो उसका प्रयत्न स्वाभाविक रूप से सफल हो...

भक्ति में कृपालुजी महाराज के बताए हुए पाँच सरल उपाय

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भक्ति का मार्ग जटिल नहीं है, बल्कि जगद्गुरु कृपालु महाराज ने इसे अत्यंत सरल और सभी के लिए सुगम बना दिया है। उनके अनुसार, आज के व्यस्त और तनावपूर्ण जीवन में भी कोई साधारण गृहस्थ सहज रूप से श्री कृष्ण भक्ति कर सकता है और ईश्वर के प्रेम का अनुभव कर सकता है। भक्ति के पांच सरल उपाय न केवल साधक के मन को शुद्ध करते हैं, बल्कि उसके पूरे जीवन की दिशा बदल देते हैं, जिससे भीतर शांति, संतोष और दिव्य आनन्द का स्रोत प्रकट होने लगता है। 1. श्रद्धा का विकास – भक्ति की पहली सीढ़ी भक्ति का प्रथम और सबसे महत्वपूर्ण आधार है सच्ची श्रद्धा। कृपालुजी महाराज समझाते हैं कि जब तक हृदय में भगवान के प्रति दृढ़ विश्वास नहीं जगता, तब तक भक्ति केवल बाहरी क्रिया बनकर रह जाती है। श्रद्धा यह भाव उत्पन्न करती है कि वास्तव में भगवान ही जीवन के एकमात्र आश्रय और करण-कारण हैं, संसार की समस्त वस्तुएँ क्षणिक हैं। रोजाना कुछ समय शास्त्र-विचार, सत्संग या प्रेरणादायी आध्यात्मिक साहित्य के अध्ययन में लगाना श्रद्धा को गहराई देता है। इससे साधक के भीतर यह स्पष्ट बोध बनता है कि भक्ति किसी विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि जीवन की सबसे ...

जीवन में सफलता पाने के लिए कृपालुजी महाराज के अहम संदेश

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  मनुष्य का जीवन केवल सांसारिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं है। सफलता का असली अर्थ तब ही समझ में आता है जब व्यक्ति अपने भीतर की शांति, प्रेम और ईश्वर के प्रति समर्पण का अनुभव करता है। जगद्गुरु कृपालु महाराज ने अपने उपदेशों में यही समझाया कि जीवन की वास्तविक सफलता केवल बाहरी सुख-सुविधाओं में नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नति में निहित है। आत्म-बोध और ईश्वर प्रेम की शिक्षा कृपालुजी महाराज का मानना था कि जब तक मनुष्य अपने भीतर छिपे दिव्य तत्व को नहीं पहचानता, तब तक उसका जीवन अधूरा रहता है। उन्होंने सिखाया कि आत्मा का संबंध शरीर या संसार से नहीं, बल्कि परमात्मा से है। जब व्यक्ति इस सत्य को स्वीकार करता है, तब उसके जीवन की दिशा और दृष्टि दोनों बदल जाती हैं। यही जागरूकता सफलता की प्रथम सीढ़ी बनती है। कर्म और भक्ति का संतुलन कृपालु महाराज के प्रवचन इस बात पर गहराई से प्रकाश डालते हैं कि केवल कर्म करने से या केवल भक्ति करने से जीवन पूर्ण नहीं होता। दोनों का संतुलन आवश्यक है। जब मनुष्य अपने कर्मों में निस्वार्थ भावना और ईश्वर के प्रति भक्ति का समावेश करता है, तो उसका प्रत्येक कार्य पुण्यकर्म बन जाता ...