कृपालुजी महाराज का रूपध्यान कैसे भगवान प्रेम जागृत करता है?
मानव जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य है भगवान से प्रेम करना और उनका साक्षात्कार प्राप्त करना। लेकिन यह दिव्य प्रेम तभी जागृत होता है जब हृदय पवित्र और भावनाओं से कोमल बनता है। इसी भावनात्मक पवित्रता को जगाने का सबसे प्रभावी साधन है कृपालुजी महाराज का रूपध्यान, जिसमें साधक अपने प्रिय भगवान के सुंदर स्वरूप का चिंतन करता है। जगद्गुरु कृपालु महाराज ने रूपध्यान को साधना का प्राण बताया है। वे समझाते हैं कि केवल दर्शन या नाम जप काफी नहीं है, जब तक मन भगवान के रूप में रस नहीं लेता। जब साधक ध्यान में भगवान के मुखकमल, उनकी मुस्कान या उनकी आंखों में झलकते करुणा भाव का अनुभव करता है, तब हृदय में सहज ही प्रेम झरने लगता है। यही रूपध्यान की सफलता है जहां साधक और साध्य दोनों एक हो जाते हैं। रूपध्यान का विज्ञान और हृदय परिवर्तन रूपध्यान केवल कल्पना नहीं है, यह हृदय को ईश्वरानुराग से भरने की प्रक्रिया है। कृपालु महाराज के अनुसार, जब हम मन को संसार से हटाकर भगवान के स्वरूप में लगाते हैं, तो मन की दिशा बदल जाती है। लगातार भावपूर्ण ध्यान से संसार की आसक्ति कम होती है और भगवान प्रेम प्रकट होने लगता है। यह प्रेम...