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Showing posts from May, 2024

कृपालु जी महाराज के सत्संग में छुपा जीवन का सार

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जब भी कोई व्यक्ति भागदौड़ भरे जीवन से थककर शांति की तलाश करता है, तो उसे जगद्गुरु कृपालु महाराज के सत्संग में वह सुकून सहज ही मिल जाता है। उनके सत्संग केवल धार्मिक प्रवचन नहीं होते, बल्कि जीवन जीने की एक संपूर्ण कला सिखाते हैं। महाराज जी अपने सत्संग के माध्यम से यह समझाते थे कि मनुष्य का वास्तविक सुख भौतिक वस्तुओं में नहीं, बल्कि आत्मिक शांति और प्रभु के प्रति समर्पण में छिपा है। सत्संग की गहराई में छिपा संदेश महाराज जी अपने सत्संगों में सरल और सहज भाषा का प्रयोग करते थे, ताकि हर आयु और वर्ग का व्यक्ति उनकी बातों को आसानी से समझ सके। वे कहते थे कि जीवन का सार त्याग, प्रेम और सेवा में है, न कि संग्रह और स्वार्थ में। उनके अनुसार जब तक मनुष्य अपने अहंकार को त्यागकर भगवान के प्रति निःस्वार्थ प्रेम नहीं करता, तब तक उसे सच्ची शांति प्राप्त नहीं हो सकती। यही कारण है कि उनके सत्संग सुनने के बाद लोगों के जीवन में एक गहरा परिवर्तन देखने को मिलता था। जीवन परिचय से मिलती प्रेरणा कृपालु महाराज का जीवन परिचय पढ़ने पर पता चलता है कि उन्होंने स्वयं अपने जीवन में साधना, तप और सेवा को सर्वोपरि रखा। उन...

जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज: भारत की आध्यात्मिक धरोहर

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भारत सदा से विश्व का आध्यात्मिक गुरु रहा है और आज भी है। समस्त महान मनीषी, साधु संत, त्रिकालदर्शी ऋषि और मुनियों को जन्म देने का सौभाग्य भारत को ही मिला है। इसी श्रृंखला में अखिल विश्व के सामने अपने अप्रतिम, अलौकिक व अखण्ड ज्ञान की पताका फहराने वाले जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ने भारत देश के उत्तर प्रदेश में स्थित मनगढ़ ग्राम में जन्म लेकर भारत की पवित्र वसुंधरा को धन्य किया। धन्यातिधन्य है भारतभूमि जहाँ समय-समय पर स्वयं भगवान् अवतार लेकर अनेक मंङ्गलमय स्वरूप धारण करते हैं। अनेक प्रकार की लीलायें करते हैं जिनका श्रवण, कीर्तन स्मरण दैहिक, दैविक, भौतिक तापों से तप्त जीवों के लिये शाश्वत सुख प्राप्ति का साधन है। कभी-कभी सच्चिदानन्द स्वरूप प्रभु स्वयं न आकर अपनी किसी शक्ति को पृथ्वी पर भेज देते हैं, जो देशकाल परिस्थिति के अनुसार गुरु रूप धारण करके जीवों को उनकी दयनीय दशा से उबार कर उन्हें भगवत्प्रेम और भगवज्ञान प्रदान करते हैं। देशकाल परिस्थिति के अनुसार उनका बाहरी रूप रंग भिन्न होते हुए भी लक्ष्य एक ही रहता है - जीव कल्याण। आत्मप्रयोजनाभावे परानुग्रह एव हि (लिंग पुराण) - महापुरुषों का...