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कृपालुजी महाराज के अनुसार सच्ची भक्ति का अर्थ

  भक्ति भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का एक महत्वपूर्ण मार्ग है। इसे केवल पूजा-पाठ, धार्मिक अनुष्ठान या मंदिर जाने तक सीमित नहीं किया जा सकता। सच्ची भक्ति मन की उस अवस्था को कहा जा सकता है, जिसमें व्यक्ति अपने आराध्य के प्रति प्रेम, समर्पण और विश्वास विकसित करता है। जगद्गुरु कृपालु महाराज ने अपने आध्यात्मिक विचारों में प्रेमाभक्ति को विशेष महत्व दिया और समझाया कि भगवान के प्रति निष्काम प्रेम ही साधना का मूल उद्देश्य है। सच्ची भक्ति में प्रेम और समर्पण कृपालुजी महाराज के अनुसार भक्ति का आधार भगवान के प्रति निस्वार्थ प्रेम होना चाहिए। जब भक्त किसी सांसारिक लाभ, प्रसिद्धि या इच्छा की पूर्ति के लिए भगवान का स्मरण करता है, तो उसकी भक्ति में अपेक्षा जुड़ जाती है। इसके विपरीत, जब मनुष्य बिना किसी स्वार्थ के अपने आराध्य से प्रेम करता है और स्वयं को उनके चरणों में समर्पित करता है, तब भक्ति अधिक गहरी होती जाती है। उनकी शिक्षाओं में यह भाव प्रमुख है कि भगवान को पाने का मार्ग केवल बाहरी दिखावे से नहीं, बल्कि मन के परिवर्तन से जुड़ा है। व्यक्ति के भीतर प्रेम, विनम्रता और ईश्वर के प्रति विश्वास बढ़ना...

प्रेम मंदिर की यात्रा – एक 12 साल के बच्चे की नजर से(जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज)

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  ठंडी की छुट्टियाँ शुरू होते ही मैं बहुत खुश था। अब पूरे दो हफ़्तों के लिए ना स्कूल जाना था, ना होमवर्क करना था। मुझे लगा पापा हमको इस बार पहाड़ों पर बर्फबारी दिखाने लेकर जाएंगे, लेकिन जब पापा ने बताया कि हम वृंदावन के प्रेम मंदिर जा रहे हैं, तो मेरी एक्साइटमेंट थोड़ी कम हो गई। मुझे लगा मंदिर में तो बस पूजा-पाठ होता है, मैं वहां जाकर क्या करूंगा! मैंने जब इसके बारे में मम्मी से बोला तो उन्होनें यह कहकर टाल दिया, "एक बार चलो तो, फिर देखना!" हम सुबह तैयार होकर दिल्ली से अपनी कार से ही वृन्दावन के लिए निकले। पापा कार चला रहे थे, मम्मी और मेरी बहन पीछे वाली सीट पर थी, और मैं आगे पापा के बगल में बैठ गया। रास्ते में मैं खिड़की से बाहर देखता रहा और सोचता रहा कि पता नहीं ये ट्रिप कैसी होने वाली है। पापा रास्ते में बता रहे थे कि प्रेम मंदिर   जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज  ने बनवाया है और यह राधा-कृष्ण जी और सीता-राम जी का मंदिर है।