कृपालुजी महाराज के अनुसार सच्ची भक्ति का अर्थ

  भक्ति भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का एक महत्वपूर्ण मार्ग है। इसे केवल पूजा-पाठ, धार्मिक अनुष्ठान या मंदिर जाने तक सीमित नहीं किया जा सकता। सच्ची भक्ति मन की उस अवस्था को कहा जा सकता है, जिसमें व्यक्ति अपने आराध्य के प्रति प्रेम, समर्पण और विश्वास विकसित करता है। जगद्गुरु कृपालु महाराज ने अपने आध्यात्मिक विचारों में प्रेमाभक्ति को विशेष महत्व दिया और समझाया कि भगवान के प्रति निष्काम प्रेम ही साधना का मूल उद्देश्य है। सच्ची भक्ति में प्रेम और समर्पण कृपालुजी महाराज के अनुसार भक्ति का आधार भगवान के प्रति निस्वार्थ प्रेम होना चाहिए। जब भक्त किसी सांसारिक लाभ, प्रसिद्धि या इच्छा की पूर्ति के लिए भगवान का स्मरण करता है, तो उसकी भक्ति में अपेक्षा जुड़ जाती है। इसके विपरीत, जब मनुष्य बिना किसी स्वार्थ के अपने आराध्य से प्रेम करता है और स्वयं को उनके चरणों में समर्पित करता है, तब भक्ति अधिक गहरी होती जाती है। उनकी शिक्षाओं में यह भाव प्रमुख है कि भगवान को पाने का मार्ग केवल बाहरी दिखावे से नहीं, बल्कि मन के परिवर्तन से जुड़ा है। व्यक्ति के भीतर प्रेम, विनम्रता और ईश्वर के प्रति विश्वास बढ़ना...

प्रेम मंदिर की पहली झलक(जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज)


 

जब हम वृन्दावन पहुंचे, तो माहौल कुछ अलग ही था। हर तरफ राधे-राधे के झंडे लगे थे, लोग भजन गा रहे थे और मंदिरों से आरती की आवाज आ रही थी। वहां पहुंचकर हम एक होटल में रुके जहां हमने दोपहर का खाना खाया और थोड़ी देर आराम किया।  

शाम को लगभग 5 बजे हम सब प्रेम मंदिर के दर्शन के लिए होटल से निकले। जैसे ही मैंने प्रेम मंदिर की पहली झलक देखी, मैं तो सरप्राइज रह गया। यह मंदिर तो मेरी कल्पना से काफी बड़ा था। बिल्कुल सफेद संगमरमर से बना मंदिर किसी महल जैसा लग रहा था! ढलते सूरज की रोशनी पड़ने से मंदिर और चमक रहा था। इतनी सफाई और सुंदरता मैंने और किसी मंदिर में नहीं देखी थी। तब मुझे लगा कि शायद ये ट्रिप उतना बोरिंग नहीं होने वाला!आगे पढ़े

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