श्री महाराज जी का संकीर्तन मन शुद्धि के लिए कैसे उपयोगी है?

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आज का कार्यालय तनाव, प्रतिस्पर्धा और असीमित अपेक्षाओं का केंद्र बन गया है। डेडलाइन का दबाव, बॉस की अपेक्षाएँ, सहकर्मियों से टकराव ये सब मन को अशांत करते हैं। ऐसे में जगद्गुरु कृपालु महाराज, जिन्हें भक्त प्रेम से श्री महाराज जी कहते हैं, ने गृहस्थ जीवन के लिए अत्यंत व्यावहारिक भक्ति उपाय दिए। उनके अनुसार कार्य करते हुए भी राधा कृपा से मन को वृंदावन जैसा शांत रखा जा सकता है। तीन मूल सिद्धांत 1. हर कार्य का अर्पण श्री महाराज जी का प्रथम सूत्र हर कार्य को राधा के चरणों में समर्पित करें। ईमेल लिखते हुए भाव रखें कि यह राधा के लिए लिख रहे हैं। मीटिंग में बोलते हुए सोचें कि राधा के भक्तों को समझा रहे हैं। यह दृष्टिकोण साधारण कार्य को पूजा में रूपांतरित कर देता है। कृपालु महाराज का जीवन परिचय बताता है कि वे स्वयं गृहस्थ अवस्था में इसी भाव से कार्य करते थे। 2. अंतर्मन नाम जप बाहर से पूर्ण मौन रहते हुए भीतर से "राधे राधे" का अविरल जप। टाइपिंग करते हुए, फोन पर बोलते हुए, रिपोर्ट बनाते हुए अंतर्मन में जप जारी रहे। यह निरंतरता मन को स्थिर रखती है। 3. विकारों का तात्कालिक प्रतिकार क्रोध आन...

भक्ति में पर्यावरण संरक्षण का महत्व क्या है जगद्गुरु कृपालु जी महाराज के अनुसार

 

जगद्गुरु कृपालु जी महाराज की शिक्षाएं भक्ति को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ती हैं, जहां प्रकृति को ईश्वर का स्वरूप मानकर उसकी रक्षा को भक्ति का हिस्सा बताया गया है। उनके संदेश में पर्यावरण और भक्ति का सामंजस्य स्पष्ट है, जो हमें वृक्षारोपण और स्वच्छता को आध्यात्मिक कर्तव्य बनाता है। कृपालु महाराज के प्रवचन प्रकृति की सुंदरता को राधा-कृष्ण की लीला से जोड़ते हैं, ताकि भक्त पर्यावरण को पवित्र मानें।

भक्ति में पर्यावरण संरक्षण का महत्व

कृपालु महाराज केकृपालु महाराज का जीवन परिचय, प्रवचन पर्यावरण को भक्ति का अभिन्न अंग बताते हैं। वे कहते थे कि प्रकृति का संरक्षण ही सच्ची भक्ति है,

, क्योंकि वृक्ष और नदियां भगवान की कृति हैं। इन प्रवचनों से प्रेरित होकर भक्त पर्यावरण रक्षा में सक्रिय होते हैं। भक्ति मार्ग पर चलते हुए स्वच्छता और संतुलन बनाए रखना आवश्यक है, जो जगद्गुरु कृपालु महाराज का मूल संदेश है। पर्यावरण प्रदूषण को वे भक्ति में बाधा मानते थे, इसलिए उनके अनुयायी आज भी वृक्षारोपण अभियान चलाते हैं।

कृपालु महाराज का आश्रम: पर्यावरण अनुकूल जीवनशैली

कृपालु महाराज का आश्रम वृंदावन और मंगल लय में स्थित है, जो पर्यावरण संरक्षण का जीवंत उदाहरण है। यहां हरित ऊर्जा और वृक्षों की बहुलता भक्ति के साथ पर्यावरण जागरूकता सिखाती है। आश्रम में सत्संग के दौरान पर्यावरण सफाई अभियान आयोजित होते हैं, जो भक्तों को प्रकृति प्रेम सिखाते हैं। यह स्थान जगद्गुरु कृपालु महाराज के संदेश को अमल में लाता है, जहां भक्ति और पर्यावरण एक साथ फलते-फूलते हैं। आश्रम की जीवनशैली हमें सादगी और संरक्षण का पाठ पढ़ाती है।

कृपालु महाराज के भजन: प्रकृति की भक्ति गीत

कृपालु महाराज के भजन प्रकृति की महिमा गाते हैं, जहां वन, नदी और पर्वत को भगवान का रूप बताया गया है। इन भजनों में पर्यावरण संरक्षण का संदेश छिपा है, जैसे "राधे राधे" में प्रकृति की लीला का वर्णन। भजनों के माध्यम से कृपालु महाराज ने भक्तों को पर्यावरण रक्षा को भक्ति से जोड़ा। ये भजन आज भी सत्संगों में गाए जाते हैं, जो श्रोताओं में पर्यावरण प्रेम जगाते हैं। जगद्गुरु कृपालु महाराज के ये भजन भक्ति को पर्यावरणीय जिम्मेदारी से भर देते हैं।

निष्कर्ष

जगद्गुरु कृपालु जी महाराज का संदेश स्पष्ट है कि पर्यावरण संरक्षण बिना भक्ति के अधूरा है। उनके आश्रम, भजन और प्रवचन हमें प्रकृति को पवित्र मानकर रक्षा करने की प्रेरणा देते हैं। आइए, इस संदेश को अपनाकर एक हरित और भक्तिमय दुनिया बनाएं, जहां पर्यावरण और भक्ति साथ-साथ विकसित हों।


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